Sadhana Shahi

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लेखनी कहानी -20-Mar-2024

फाल्गुन शुक्ल पक्ष एकादशी आमलकी /रंगभरी एकादशी

वास्तु शास्त्र में बहुत से ऐसे पौधों का वर्णन किया गया है जिन्हें घर में लगाने से अत्यधिक पुण्य की प्राप्ति होती है। उन पौधों में एक पौधा है आंँवला, जिसे लगाना धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोगों का ऐसा मानना है कि आंँवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास होता है, वहीं दूसरी तरफ़ यह भी माना जाता है कि घर में उत्तर या पूर्व दिशा में आंँवले का वृक्ष लगाने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है।

आंँवले के वृक्ष की उत्पत्ति


यदि हम धर्म ग्रंथो की मानें तो जिस प्रकार शिव के आंँसुओं से रुद्राक्ष के वृक्ष की उत्पत्ति हुई उसी प्रकार ब्रह्मा जी के आंँसुओं से आंँवला वृक्ष की उत्पत्ति हुई।

इस वृक्ष की उत्पत्ति के विषय में कहा जाता है कि इसकी उत्पत्ति ब्रह्मा जी के आसुओं से हुई। यदि हम पुराणों की मानें तो स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अनुसार एक बार जब पृथ्वी जलमग्न हो गई थी तब ब्रह्माजी के मन में दुबारा सृष्टि की रचना करने का विचार आया तब ब्रह्माजी कमल के पंखुड़ियों पर परब्रह्म की तपस्या में लीन हो। उनकी तपस्या से प्रसन्न हो साक्षात विष्णु भगवान प्रकट हो गए जिन्हें देखकर ब्रह्माजी रुदन करने लगे। उनके रोने के फलस्वरुप उनकी आंँखों से निकले आंँसू विष्णु भगवान के चरणों पर गिरने लगे जिससे आंँवला वृक्ष की उत्पत्ति हुई।

आदि रोह या आदि वृक्ष


कई स्थलों पर आँवले के वृक्ष को धातृ वृक्ष भी कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि आँवला का वृक्ष धर्म का आधार स्तंभ है। यह पिक नारायण को अत्यंत प्रिय है। जब महर्षि ब्रह्मा जी ने सृष्टि का सृजन किया तब वृक्षों की श्रृंखला में सर्वप्रथम आँवले वृक्ष का ही निर्माण हुआ। सर्वप्रथम इस वृक्ष का निर्माण होने के कारण ही इसे आदि रोह या आदि वृक्ष कहा जाता है।

एक मान्यता के अनुसार जिस तरह समुद्र मंथन में विष की हल्की बूंदें जहां-जहां गिरी वहां पर भांग-धतूरा जैसी बूटियां जन्मीं तो वहीं अम़ृत की बूंदें जहां छलकीं वहांँ पर आम,नीम,अशोक,आंँवला आदि गुणकारी वृक्षों का जन्म हुआ।

आंँवले का वृक्ष लगाने का महत्व


यदि हम धार्मिक ग्रंथों की मानें तो एक आंँमलकी या आंंवला एकादशी का व्रत करने से एक राजसूय यज्ञ के पुण्य के पुण्य की प्राप्ति होती है। यह आश्चर्यजनक कर देने वाली बात है कि यदि कोई स्त्री शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को आंँवले के वृक्ष के नीचे पूजा करती है – अभिषेक करती है तो वह जीवन पर्यंत ऐश्वर्यशाली बनी रहती है।

अक्षय नवमी और आँवला


अक्षय नवमी के दिन जो व्यक्ति आंँवले के वृक्ष के नीचे भोजन ग्रहण करता है उसके अंदर प्रतिरोधक क्षमता की बढ़ोत्तरी होती है तथा दीर्घायु को प्राप्त होता है।

हर तरह की समस्याओं से निजात दिलाता है आंँवला


आंँवले के वृक्ष के नीचे ब्राह्मणों को भोजन करा कर दान- दक्षिणा देने से जातक सहज ही अनेकानेक समस्याओं से मुक्ति पा जाता है। वह जो भी कार्य प्रारंभ करता है उसमें उसे सफलता प्राप्त होती है।

फाल्गुन शुक्ल पक्ष एकादशी वैसे तो आंँवले के वृक्ष के नीचे भोजन ग्रहण करना, उसके छांव में सोना सदा ही शुभ फलदायक होता है। जिसे आमलकी एकादशी, रंगभरी एकादशी, आंँवला एकादशी या अमली ग्यारस कहा जाता है।

हिंदू धर्म के अनुसार हर माह में दो एकादशी व्रत होते हैं। प्रत्येक माह के प्रत्येक एकादशी का अपना विशेष महत्व है, लेकिन इन सभी मेंआमलकी एकादशी का सबसे अच्छा स्थान रखा गया है। आमलकी एकादशी के दिन श्री हरि विष्णु और आंँवले के पेड़ की पूजा की जाती है। मान्यता है कि आंँवले का व्रत भगवान विष्णुजी को अत्यंत प्रिय है क्योंकि यह एकादशी होली से कुछ दिन पूर्व अआती है इसलिए इसे रंगभरी एकादशी कहा जाता है तथा आंँवला वृक्ष की पूजा करने के कारण आमल की एकादशी भी कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि फागुन मास के कृष्ण पक्ष चतुर्दशी,महा शिवरात्रि को शिव और पार्वती का विवाह हुआ था तथा रंगभरी एकादशी के दिन उनका गौना हुआ था।इस बार यह एकादशी फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को 20 मार्च 2024 बुधवार को हर्षोल्लास से के साथ मनाया जाता है इस पर्व से जुड़ी कथा इस प्रकार है-

आमलकी एकादशी की कथा


बहुत समय पहले फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को एक राज्य का राजा अपने बंधु- बांधवों और प्रजा के साथ आमलकी एकादशी का व्रत किया और मंदिर में जाकर कलश स्थापित कर धूप -दीप, ऋतु फल ,पंचरत्न, नैवेद्य आदि से विधिवत आंँवले के वृक्ष का पूजन और आरती किए।

आमलकी एकादशी की आरती

हे धात्री! आप ब्रह्मस्वरूप हैं, आप ब्रह्माजी द्वारा प्राप्त हुए हैं, सभी पापों का नाश करने वाले हैं, आपको प्रणाम है। मुझ पर कृपा करके, आप मेरा अर्घ्य स्वीकार करते हैं, आप श्रीराम चंद्रजी द्वारा सम्मानित हैं, मैं आपकी प्रार्थना करता हूं, अत: आप मेरे समस्त पापों का नाश करें,

इस प्रकार पूजा -अर्चना और आरती कर राजा अपनी प्रजा तथा बंधु- बांधवों के साथ उसी मंदिर में रात्रि जागरण किए।

वहांँ पर दुराचारी बहेलिया का आना


जब राजा पूजा-पाठ करके अपनी प्रजा तथा बंधु-बाँधवों के साथ विष्णु मंदिर में रात्रि जागरण कर रहे थे उसी समय वहांँ एक अत्यंत पापी और दुराचारी बहेलिया आ गए। जो अपने परिवार का पालन-पोषण निरीह और निरपराध की हत्या करके करता था। लोगों की भीड़ को देखकर बहेलिया मंदिर के एक कोने में छिप कर बैठ गईं, वह भूख और पत्तों से बेहद व्याकुल था। वह कोने में भगवान विष्णु और आमलकी एकादशी की कथा का श्रावण कर अनचाहे रात्रि जागरण किया तथा पुण्यदाई कथा को सुनने का लाभ उठाया।

प्रातः काल सभी के साथ बहेलिया भी अपने घर को चला गया घर पहुंँच कर उसने भोजन किया जिसके कुछ क्षण के पश्चात ही वह स्वर्ग सिधार गया।

आमलकी एकादशी व्रत की कथा सुनने के पुण्यलाभ के फलस्वरूप वह राजा विदूरथ के घर जन्म लिया। राजा ने अपने पुत्र का नाम वसुरथ रखा।

समय बीतता गया और वह युवावस्था में आ गया ।युवा होने पर वह चतुरंगिनी सेना तथा धन- धान्य से सुसज्जित होकर 10,000 ग्रामीण लोगों का पालन-पोषण करने लगा।

उसके अंदर सूर्य का तेज तथा चंद्रमा की कांति विद्यमान थी। वह लक्ष्मीपति के समान वीर तथा धरा के समान क्षमाशील था। वह अत्यंत धार्मिक ,ज्ञानी, दानवीर ,कर्मवीर विष्णु भक्त था। अपने प्रजा का पालन वह अपने संतति के सामान करता था।

एक दिन राजा शिकार खेलने गए और वन में वह रास्ता भूल गए। बहुत ढूंँढने के बाद भी जब उन्हें मार्ग नहीं मिला तब आराम करने के लिए एक वृक्ष के नीचे सो गए। कुछ समय पश्चात वहांँ पर राजा को अकेला देखकर जंगली मलेक्ष आ गए और मारो- मारो करते हुए उन्हें घेर लिए। वे मलेक्ष कहने लगे यह राजा हमारे माता-पिता ,संतति ,बंधु – बांधवो का हत्यारा है। तथा उन्हें देश निकाला दिया है अतः हमें इसकी हत्या कर देनी चाहिए।

ऐसा कहने के पश्चात मलेक्ष राजा पर अनेकानेक अस्त्रों,- शस्त्रों से प्रहार करने लगे। किंतु आमलकी एकादशी के व्रत के प्रभाव से अस्त्र – शस्त्र राजा के शरीर पर गिरते ही नष्ट हो जाते और उनका प्रहार पुष्प के समान प्रतीत होता। कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु की लीला के फलस्वरुप मलेक्षों के अस्त्र राजा से हटकर उल्टा उन्हीं पर प्रहार करने लगे। और वो एक-एक करके मूर्छित होकर गिरने लगे।

उसी समय राजा के शरीर से एक अत्यंत सुंदर भृकुटी टेढ़ी की हुई स्त्री पैदा हुई उनकी आंँखों से मानो धधकती अग्नि निकल रही थी। जिससे वो काल के समान प्रतीत हो रही थीं।

वो स्त्री मलेक्षों पर टूट पड़ीं और थोड़ी ही देर में सबको मौत के घाट उतार दीं।

जब राजा सो कर उठे तो यह सब देखकर बहुत भौचक्के हो गए ,और उन्हें स्थिति का अनुमान लगाते देर नहीं लगा। किंतु, वो सोचने लगे कि इस वन में मेरा हितैषी कौन है! जिसने हमारी रक्षा की।

तभी आकाशवाणी हुई हे पुण्यात्मा राजा! विष्णु भगवान के अतिरिक्त इस संसार में कौन तेरी मदद कर सकता है। इस आकाशवाणी को सुनकर राजा मन ही मन पीतांबरधारी विष्णुदेव को प्रणाम किए और अपने राज्य को वापस लौटकर सुखपूर्वक अपने परिवार , बंधु- बांधवों और प्रजा के साथ राज-काज चलाने लगे।

यह सब कुछ आमलकी एकादशी की कथा सुनने के प्रभाव से हुआ कि एक अत्यंत पापी , दुराचारी बहेलिया दानवीर ,कर्मवीर, पुण्यात्मा राजा का जन्म पाया, और अंत में विष्णु लोक को प्राप्त हुआ। ऐसा है आमलकी एकादशी व्रत और कथा का प्रभाव ।जो भी व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति के साथ विधिवत् करता है वह जीवन पर्यंत सौभाग्य को प्राप्त होता है, तथा मरणोपरांत विष्णु लोक को प्राप्त होता है।

साधना शाही, वाराणसी

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5 Comments

Babita patel

30-Mar-2024 09:50 AM

Amazing

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Varsha_Upadhyay

23-Mar-2024 10:59 PM

Nice

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Sushi saxena

22-Mar-2024 10:49 PM

Nice

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